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आखिर सब फैसला आलाकमान पर ही क्यूं?

By on December 14, 2018 0 72 Views

 

सभी राजनीतिक पार्टियां आखिर सब काम, चयन, और फैसले आलाकमान पर ही क्यों छोड़ रहे हैं। क्या वह अपने आप में तानाशाही प्रवृत्ति नहीं हैं? यह अब कांग्रेस में भी हो रहा है और भाजपा में भी। कांग्रेस में तो लोकतांत्रिक पद्धति से विधायक दल का नेता चुनने की बहुत पुरानी परम्परा है। राजस्थान में भी इस प्रक्रिया को अधिकांशतः अपनाया गया। आपको वर्ष 1954 में ले चलते हैं। तब कौन बनेगा मुख्यमंत्री का संकट पैदा हो गया था। वजह थी पूर्व मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास के विरूद्ध पार्टी में खिलाफत शुरू हो गई। तब दो गुट बन गए थे। एक गुट पूर्व मुख्यमंत्री व्यास का समर्थन कर रहा था तो दूसरा गुट मोहन लाल सुखाड़िया का। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता माणिक्य लाल वर्मा भी व्यास के विरोध में खड़े हो गए। केन्द्रीय नेताओं ने राजस्थान आकर दोनों गुटों के नेताओं को समझाने-बुझाने के कई प्रयास किए। लेकिन वे सारे प्रयत्नज ब विफल साबित हो गए तो फिर शक्ति परीक्षण हुआ। यानी नेता पद का चुनाव। इस चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास 8 मतो से पराजित हो गए। व्यास के पक्ष में कांग्रेस के 51 और सुखाड़िया घोषित कर दिए गए राजस्थान कांग्रेस विधायक दल के नता।
दूसरा अवसर तब आया जब पूर्व मुख्यमंत्री बरकतुल्ला खान का अचानक देहावसान हो गया। अब अगला नेता कौन हो? दो नेता इस दौड़ में आगे आए। जिनमें एक रामनिवास मिर्धा ( पूर्व केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री) और दूसरे थे सुखाड़िया समर्थक हरिदेव जोशी चुन लिए गए। यहीं लोकतांत्रिक पद्धति प्रक्रिया है। आलाकमान ने तब विरोधी गुट के विधायकों को भी मंत्रिमंडल में स्थान दिया। लेकिन नेता पद ने चयन का केन्द्रीयकरण क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने की स्वस्थ परम्परा है? हर छोटी-बड़ी बात का फैसला आला कमान ही क्यों करें? क्या यह सत्ता का केन्द्रीयकरण नहीं है? यही भाजपा में हो रहा है। यहीं कांग्रेस में भी। आखिर क्यों नहीं चुने जाते प्रदेश अध्यक्ष लोकतांत्रिक प्रक्रिया से? क्यों थोपे जाते है आलाकमान की ओर से? फिर जब विरोध होता है तो इसका असर पार्टी के कार्यकर्ताओं पर भी पड़ता है। पंचायत चुनाव से लेकर नगर निगम के चुनाव में भी सरपंच, पालिक/परिषद अध्यक्ष और निगम के महापीर पर के चयन में ऐसा ही हो रहा है। पार्टी किसी योग्य और कुशल नेतृृत्व अथवा प्रबंधन करने वाले को आगे लाना चाहती है तो वह अपना संकेत दे दे या फिर उसके लिए पार्टी का मानस बनाए। लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों और उसकी प्रक्रिया को ध्वस्त होने दे।

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