March 18, 2019
Breaking News

Sign in

Sign up

  • Home
  • Tonk Special
  • चुनावों में करारी हार के बाद अब मंथन का क्या फायदा ?

चुनावों में करारी हार के बाद अब मंथन का क्या फायदा ?

By on December 20, 2018 0 43 Views

 

जिस समय भाजपा संगठन को प्रदेश स्तर पर गंभीर मंथन करना था, चुनावी रणनीति बनानी थी, बूथ स्तर तक का प्रबंधन कना था, तब तो कुछ नहीं किया। अब करारी हार के बाद गंभीर मंथन चल रहा है। मंथन चलना भी चाहिए। हार-जीत तो होती ही रहती है। लेकिन संगठनात्मक तरीके से मजबूत कहीं जाने वाली पार्टी की यह हार अब उन्हें याद दिला रही है कि काश उनका संगठन मजबूत होता तो एक आध प्रतिशत से हार नहीं होती। जयपुर, जो कि भाजपा परम्परागत गढ़ रहा है वह भी ध्वस्त हो गया। कारण सब जानते थे। सफाई व्यवस्था चुस्त और दुरूस्त न होना, आपसी किच-किच, सभाओं में हंगामा, निगम की कार्यशैली से जन आक्रोश भी कुछ ऐसे कारण थे कि मतदाता रूष्ट रहे। प्रदेश स्तर पर मजबूत संगठन का दावा करने वाले भाजपा नेता और कार्यकर्ता मतदाताओं को बूथ तक नहीं ला पाए। कांग्रेस द्वारा उठाए गए स्थानीय, किसानों से संबंधित, बेरोजगारी के मु६ो का कोई माकूल जवाब नहीं दे पाए। सत्ता और प्रशासन, गांव-गांव, शहर-शहर पहुंचने के अभियान अवश्य चलाता रहा। लेकिन ग्रामीणों और शहरवासियों के दिलों को नहीं छू पाए। कर्मचारियों की वेतन विसंगतियों को मिटाने की जायज मांगों को मानने में क्यों ढिलाई बरती गई। इसके लिए गठित समितियां मसले को क्यों उलझाती रही? ये सवाल भी आज उठ रहे है। भाजपा के पूर्व सत्ताधीशों के समक्ष। राष्ट्रीय स्तर के उठे वाद-विवाद (राफेल, जीएसटी, नोटबंदी और रोजगार) के बारे में भाजपा कार्यकर्ता तक असमंजस में क्यों रहे? कार्यकर्ताओं को मतदाता तक पहुंचने में कतराना क्यों पड़ा? प्रदेश की पार्टी एकजुट होकर प्रचार कार्य में क्यों नहीं जुटी कुछ ऐसे ही कई प्रश्न है जो भाजपा को पराजय के द्वार तक एक-एक ईंच रेंग-रेंग कर पहुंचाते है। कांग्रेस की हल्ला बोल प्रचार नीति का भाजपा सामना नहीं कर पाई। अब मंथन का निष्कर्ष क्या निकला? यह भी सामने आना चाहिए।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!