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बनास का खरबूजा अतीत के पन्नों में सिमटा

By on October 19, 2018 0 77 Views

देशभर में अपनी मिश्री सी मिठास के लिए पहचान रखने वाला बनास का खरबूजा अतीत के पन्नाों में सिमटकर ही रह गया है। बीसलपुर बांध के निर्माण के साथ ही बनास के खरबूजे की पैदावार में प्रतिवर्श आई कमी आज इस स्थिति पर पहुंच चुकी है कि खरबूजा को देखने के लिए षहर वासियों की आंखे भी तरस गई हैं, जबकि बनास का खरबूजा दो दषक पूर्व अपनी मिठास का जादू टोंक में ही नहीं बल्कि दिल्ली, इंदौर, भोपाल सहित कई महानगरों में फैलाता था, लेकिन खरबूजे की समाप्ति के साथ ही खरबूजे की फसल तैयार करने वाले करीब 10 हजार कीर बेरोजगारी के कगार पर आकर फाकाकषी तक आ खड़े हुए हैं। कई लोग तो अपना धंधा बदल दैनिक मजदूरी कर पेट भरने पर मजबूर है, तो कई किसी अन्य दहाडी में लग चुके है। वेसै तो बनास के खरबूजे समाप्ति के पीछे बीसलपुर बांध का निर्माण होना मुख्य कारण समझा जा रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्शो से अकाल की विभीशिका ने भी जलस्तर को रसातल में धंसा दिया है, जिसके कारण पारम्परिक जलस्त्रोतों के माध्यम से भी खरबूजे की फसल की सिंचाई करना दूभर हो गया है। फलस्वरूप जिले के छावनी, गहलोद, फूलबाग, गोल डूंगरी, जानबाज का बंधा, सईदाबाद, सरवराबाद, नया गांव ककराज, खेड़ा, मेहंदवास, राधावल्लभपुरी, ष्योपुरी, देवली क्षेत्र के बीसलपुर, राजमहल, बारेड़ा, देवपुरा, इन्द्रपुरा, छातड़ी, नेगड़ियां, बाटंूदा सहित दर्जनभर गांवों मे आय का मुख्य स्त्रोत बना बनास का खरबूजा अब उत्पादन न होने के कारण परेषानी का सामना करना पड़ रहा है। पिछले 7-8 वर्शो से नदी के दो सौ मीटर दूर वाले कुंओं, हैंडपंपो में पानी का जलस्तर इस तरह नीचे चला गया है, जबकि संथली, गहलोद, खेड़ा, भरनी, छाण आदि गांवों में 100 से 125 फीट दूर समानान्तरण भूमि वाली पट्टी में पानी गढ्डों में भरा हुआ रहता है। यह पानी केवल मवेषियों की पीने के काम आता है, लेकिन इसमें 25 मीटर दूर वाले खेत तो बंजर हो गए हैं, जबकि एक दषक पूर्व तक यहां से खरबूजे खरीदने के लिए लोग दिल्ली तक से आते थे तथा कई महिने पूर्व ही यहां पहुंचकर अपने डेरे जमा लेते थे। अनेक व्यापारिक कंपनियां ट्रकों में माल का लदान करवाकर ले जाते थे और काष्तकार अपनी 3-4 महिने की मेहनत से ही बारहो माह तक की रोटी की व्यवस्था कर लेते थे। इसका उत्पादन लगभग समाप्त होने से करीब 10 हजार लोग बेरोजगारी का षिकार हो दयनीय जीवन बिता रहे हैं, वहीं पिछले दो दषकों में खरबूजे के निर्यात से राजस्व प्राप्ति में भी सरकार को करोड़ों का नुकसान उठाना पड़ रहा है। सन 1985 में बीसलपुर बांध के निर्माण के बाद से खरबूजे की फसल के घटने के बावजूद इसके विलुप्त होने हे कारणों की जांच प्रतिवर्श केवल कागजों में ही सीमित होकर रही जाती है।

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