January 18, 2019
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मायुस है बिजेपी कार्यकर्ता

By on December 13, 2018 0 40 Views

हालांकि 15वीं विधानसभा के चुनाव में अथक परिश्रम करने वाले भाजपा कार्यकर्ताओं को निवर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने धन्यवाद तो दिया है, लेकिन ये कार्यकर्ता आज बहुत ज्यादा मायूस है। क्योकि चुनाव से पूर्व उन्हैं सत्ता और संगठन से वह तवज्जो नहीं मिली, सम्मान नहीे मिला जिसकी उन्हें अपेक्ष थी।

यही नहीं पिछले चार सालों से संगठन का ढाचा लुंजपंुज था। पूर्व अध्यक्ष अषोक परनामी ने प्रेरक बन कर भजपा संगठन के लिए अपेक्षित कार्य नहीं किया। सत्ता ने भी संगठन के इस ढीले पर गौर नहीं किया। भाजपा अध्यक्ष अमित षाह ने जब संगठन के ढांचे को मजबूत करने के लिए चेद्रषखर को उत्तर प्रदेष से यहा भेज कर संगठन मंत्री बनाया तो वे भी पूरे प्रदेष के भाजपा कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित नहीं कर पाए।
राजस्थान भाजपा का विधायक दल ही अपने-अपने क्षेत्र में संगठन का सर्वेसर्वा बनकर काम देखता रहा। सत्ता के षीर्श नेताओं और सीएमओ ने भी उन्हें ही तरजीह दी। भाजपा आलाकमान ने अषोक परनामी के इस्तीफे के बाद जब पहले अर्जुन मेघवाल और बाद में गजेन्द्र सिंह षेखावत (दोनों केन्द्रीय मंत्री) को प्रदेष भाजपा अध्यक्ष बनाकर भेजनेका प्रस्ताव किया तो स्वयं सत्ता के षीर्श नेता मुख्यमंत्री ने ही इसका विरोध जातीय समीकरण की वजह से किया। बाद में वर्तमान प्रदेष अध्यक्ष मदनलाल सैनी के नाम पर सहमति हुई। तब तक कार्यकर्ता संगठन और सत्ता से षनैः षनैः दूर होता चला गया। पहले यदि सत्ता तक कार्यकर्ताओं की पहुंच नहीं हो पाती थी तो तबके संगठन मंत्री गुप्ता के माध्यम से संबधित मंत्रियों तक पहंुचे हो जाती थी।

इस चुनाव में भी संगठन स्तर पर कोई प्रचार प्रसार और कार्यकर्ताओं को मोटीवेट करने की चुनाव नीति तैयार नहीं हुई। जो कुछ भी हुआ वह सी.एम.ओ. स्तर से हुआ। जनसहभागित की आवाज उठाने वाली भाजपा सरकार कार्यकर्ताओं की समर्पित और सक्रिया सहभागित चुनावों में नहीं जुटा पाई। संगठन कौषल में महारात हासिल करने वाली भाजपा एक षिथिल संगठन वाली पार्टी बन गई। यह चुनाव प्रचार बुथ मैनेजमेंट, सत्ता प्रतिनिधि की उदासीनता से देखा जा सकता था। संगठन की बजाय विधायक दल और विधायक को ही हेवी हेण्ड मिला। इस और किसी ने भी गंभीरता से गौर नहीं किया।

हर क्षेत्र में चुनाव प्रचार और मुद्दे कौन से उठाए जाएं भी तय नहीं था। बस कांग्रेस आरोपों का भी प्रत्यारोप और जवाब देने तक ही प्रचार सिमट गया। जबकि भाजपा संगठन अपनी सरकार के प्रभावषाली और लोकलुभावने कामों का कार्यकर्ताओं के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाकर उन्हें जमीनों हकीकत नहीं बता सकी। सत्ता और संगठन केन्द्रित नहीं। अब लगातार एक साल तक और वहा भी चुनाव के पूर्ववत तक यही स्थिति रहे तो इसका असर होना तो स्वाभाविक है। हालाकि कांग्रेस स्वयं अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा नही छू सकी। यदी कार्यकर्ताओं की फौज को इसमें छह माह पूर्व ही जुटा दिया जाता तो आज यह मायुसी नही देखी जाती। इस और किसी ने भी गंभीरता से गौर नहीं किया।

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