March 21, 2019
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कर्ज माफी की खतरनाक नीति

By on December 24, 2018 0 119 Views

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव परिणामों से जो माहौल बन रहा है। उसका असर हिंदो पट्टी के अन्य राज्यों तक भी विस्तारित हो सकता है। जहां उत्तर प्रदेश और बिहार में त्रिपक्षी क्षेत्रीय दलों को कुछ फायदा हो सकता है, वहीं झारखंड जैसे राज्य में कांग्रेस खुद प्रभावी होकर उभर सकती है। इसी तरह बिहार और उत्तर प्रदेश के महागठबंधन में कांग्रेस का महत्व बढ़ सकता है, किंतु इन सबका मुकाबला भाजपा से ही होना है, जो बेहद चतुराई के साथ चुनावी अखाडे़ में मुकाबला करने में महारत रखती है।

मनमोहन सरकार द्वारा वर्श 2008-09 में घोशित 70 हजार करोड़ रूपए से अधिक की कर्ज माफी ने भले ही संप्रग को दोबारा सत्ता दिलाने में अहम भूमिका निभाई हो, लेकिन इस कर्ज माफी ने जिस नई परंपरा का बीज बोया, उसकी फसल अब चारों और लहलहा रही है। एक कर्ज माफी अगली कर्ज माफी की नींव तैयार कर रही है। सही कारण है कि बैंकों में फंसे कर्जो यानी एनपीए का स्तर लगातार बढ़ रहा है। मध्य प्रदेष, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कर्ज माफी के तथाकथित हिट फाॅर्मूले से उत्साहित कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अब कर्ज माफी के मु६े पर ही आम चुनाव लड़ने का एलान कर रहे हैं और साथ ही मोदी सरकार कप कर्ज माफी की घोशणा करने का दबाव भी बना रहे हैं। उनके मुताबिक यदि मोदी सरकार किसानों का कर्ज माफ नहीं करती तो 2019 में सत्ता में आने पर कांग्रेस सरकार गांरटी के साथ देश के किसानों का कर्ज माफ करेगी।

सरकार जिन फसलों का समर्थन मूल्य घोशित करती है उन सभी की सरकारी खरीद नहीं हो पाती। मसलन, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में लाल मिर्च का एमएसपी 12000 रूपए कुंतल निर्धारित है जबकि थोक बाजार में यह चार से छह हजार रूपए कुंतल बिक रही है। इसी तरह उप्र और बिहार में मूंग समर्थन मूल्य से नीचे बिक रहा है। जिन फसलों की सरकारी खरीद होती है वहां भी किसानों को कई दिनों तक धक्के खाने पड़ते हैं। कई बार इसमे बचने के लिए किसान को अपनी उपज स्थानीय साहुकारों को सस्ते में बेचना ठीक लगता है। यह सुनिश्रित करने की जरूरत है कि किसानों को उनकी उपज का सही मुल्य हर हाल में मिले।

राश्टीय नमूना सर्वेक्षण संगठन यानी एनएसएसओ की 70वीं कृशि गणना के मुताबिक 9.02 करोड़ ग्रामीण परिवारों में आधे से अधिक परिवार कर्ज के बोझ तले दबे थे। यदि इस ऋश्टा का औसत निकाले तो यह 42000 रूपए प्रति परिवार बैठेगा। एनएसएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक प्रति किसान परिवार की मासिक आमदनी 6426 रूपए है। इनमें सें 52 फीसदी आमदनी गैर कृशि कार्यो से पैदा होती है। जैसे पषुपालन, मजदूरी और अन्य दूसरे काम। कुछ समय पहले तक खेती से इतर जिन गतिविधियों से किसानों को नकद आमदनी होती थी वे मुक्त व्यापार नीतियों की भेंट चढ़ती जा रही हैं। यहां किसानों को नकद आमदनी दिलाने वाले डेयरी क्षेत्र का उदारहण प्रासंगिक है।

2008-09 और 2017-18 के बीच देष में दूध उत्पादन में 57 फीसदी वृद्धि हुेई किंतु इस बढ़ोतरी के साथ खपत का बाजार नहीं बढ़ा। नतीजा यह हुआ कि दूध की थोक कीमतों में गिरावट आ गई। पहले अतिरिक्त दूध को निर्यात बाजार में खपा दिया जाता था, लेकिन वैश्रिक जिंस बाजारों में गिरवट से स्किम्ड मिल्क पाउडर के निर्यात पर भी असर पड़ा। उदाहरण के लिए दिसंबर 2013 में स्किम्उ मिल्क पाउडर की कीमत 4868 डाॅलर प्रति टन थी, जो नवंबर 2018 में 1965 डॅालर ही रह गई। कमोबेश यही हालत चीनी, काली मिर्च, नारियल जैसे नकदी फसलों की है। इन स्थितियों को देखते हुए पक्ष-विपक्ष के सियासी दलों को कर्ज माफी जैसे लोक-लुभावन फैसलों के बजाय खेती-किसानी को मुनाफें का सौदा बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

कम से कम अब तो उन्हें समझ जाना चाहिए कि कर्ज माफी नीति एक तरह की आत्मघाती नीति है। केंद्र व राज्य सरकारें मिलकर बीज, खाद, उर्वरक, सिचाई, अत्र भंडारण और विपणन में सुधार करें। फसल बीमा को व्यापक बनाकर उसमें किसान परिवार की बीमारी, षिक्षा आदि को भी शामिल किया जाए, ताकि किसान आकस्मिक झटकों से बच सके। सबसे बढ़कर खेती-किसानी को उधोग का दर्जा दिया जाए, ताकि निजि क्षेत्र निवेश करने को आगे आए।

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