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 रियासतकालीन टोंक की लोकतांत्रिक व्यवस्था..

By on November 11, 2018 0 242 Views
कमलेश कुमार महावार, टोंक l राजस्थान की एकमात्र नवाबी या फिर यूं कहे कि एकमात्र मुस्लिम रियासत रही टोंक नगरी में चुनावी मिजाज़ सत्ता के साथ रहा हैं, यहां से जनप्रतनिधि चुनने वाला हर विधायक सरकार का प्रतिनिधि रहा हैं यानि यहां से चुनने वाला विधायक विपक्ष में नही बैठा। बात करे रियाकालीन की तों यहा पर पहला राजनैतिक दल अंजुमन रियाया के नाम से रहा हैं, जिसके नुमाइंदे तत्कालीन नवाब से जनता के हित में काम करवाते थे। यानि शासन (नवाब) और जनता के बीच यह दल पुल का तरह काम करता था।
1885 में कांग्रेस की स्थापना के साथ-साथ टोंक नवाब ने अपनी आवाम से सामान्जस्य बैठाने के लिए एक राजनैतिक कमेटी बनाई। जो रियासतकालीन टोंक की पहली कमेटी या फिर यूं कहे यहां का पहला राजनैतिक दल था, जिसका कार्य जनता की मांगों और आवष्यकताओं को नवाब के आगे पैष करना जिसें नवाब इच्छानुसार पूरे करते थे। यही से रियासकालीन टोंक की राजनैतिक पृश्ठभूमि षुरू हुई और इस तरह की राजनैतिक वार्तालाप के लिए वर्तमान में विष्वप्रसिद्ध सुनहरी कोठी एवं रंगीन कोठी प्रमुख स्थान बनाया गया और यही जनता की मांगे अग्रेज एजेंटो के आगे भी रखी गई थी। इस तरह नवाब द्वारा स्थापित यह समिति आज टोंक में कांग्रेस और भाजपा के विस्तृत रूप देखने को मिलती हैं। यही कारण हैं कि यहां के नेता विपरित दलों में होने हुए भी अपना भाईचारा नही भूलते हैं बात आजादी के बाद की करे तो यहां से जितने वाला हर उम्मीदवार सरकार के पक्षकार रहा हैं यहां से जीतकर उसे विधानसभा में विपक्ष में नही बैठना पड़ा अर्थात अधिकतर यही रहा कि जो यहां से जीता राज्य में सरकार भी उसी पार्टी की बनी। वही यहां के लोगो ने साम्प्रदायिक सौहार्द को पहले रखते हुए धार्मिक उन्माद फैलाने वाले लोगो की जगह जनता से जुडे निश्पक्ष व्यक्तियों की वरीयता दी।
नवाबों के आखिरी दौर में अंजुमन रियाया के बाद प्रजा मंडल की स्थापना हुई जिसमें महत्वपूर्ण भूमिका रामबाबू सक्सैना ने निभाई। वही मुस्लिम लीग ने भी यहां पैर फैलाने की कौषिष की लेकिन गंगा-जमूनी तहजीब के कारण यहां के मुस्लिमों ने ही मुस्लिम लीग को नकार दिया, जिससें वह यहां पर असफल रही। इसका परिणाम यही रहा कि यहां पर वही उम्मीदवार सफल रहे जो धार्मिकता को राजनीति के साथ नही चले। यही कारण रहा हैं कि यहां से धर्मनिरपेक्ष दलों ने राज किया और धार्मिक पार्टियों को यहां महत्व नही मिल पाया हैं, नवाबी दौर में षरिया-षरीयत का दफ्तर वर्तमान में जिला कांग्रेस कमेटी कार्यालय के रूप में जाना जाता हैं। हालांकि समय साथ यहां पर लोगो के विचारों से लेकर राजनैतिक नुमाइंदों चेहरे बदलते रहे। लेकिन कभी उन्होनें सार्वजनिक तौर पर धर्म को राजनीति पर हावी नही होने दी और सदियों से जारी स्वच्छ राजनीति को बनाए रखा।
राजस्थान का टोंक आजादी से पहले जहा उर्दू अदब में राजस्थान के लखनरू के नाम से मषहूर था, वही अपनी ऐष्वर्यता के लिए राजस्थान का हैदराबाद कहलाता था। हम आपकों बता दे आजादी से पहले हैदराबाद देष की सबसे अधिक धनवान रियासत थी जिसके मीर उस्मान अली खान दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति रहे। यही कारण हैं आज भी यहां से चुनाव लडने के लिए उम्मीदवारों की होड़ मची रहती हैं, वर्तमान में भी यहां से चुनाव लडने के लिऐ भाजपा एवं कांग्रेस के नेता लंबी कतार में खडे हैं, हालांकि यहां पर लोग स्वच्छ छवि वालों को भी पसंद करते हैं
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