November 13, 2018
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गूर्जरो की छांट प्रथा

By on November 7, 2018 0 30 Views

 

भारतीय सस्कृती के अनेंक रंगों मे से एक यह भी है लोग त्यौहारो को भी अलग-अलग ढंग से मनाते है, राजस्थान के टोंक जिलें में दीपावली के दिन गुर्जर समाज के लोग सबसे पहले अपने पुर्वजो को याद कर उनकी स्मृती मे छांट भरकर इस महा पर्व की शुरूआत करते है, आज भी टोंक में अलग-अलग जगहों पर हजारों गुर्जर परिवारों ने दीपवाली के दिन सबसे पहले अपने पूर्वजों को याद करने के साथ श्रंद्धाजंलि दी और पीढियांे से गुर्जर समाज द्वारा चतुर्भुज तालाब पर अपने पूर्वजों को याद कर उन्हे तर्पण करने की परम्परा का निर्वहन किया गया। टोंक मे हर साल गूर्जर समाज के द्वारा अपने पूर्वजों का याद करने के अनोखे तरीके निर्वहन किया गया और पानी मे पूर्वजों को तर्पण कर उन्हे याद किया गया, टोंक जिला मुख्यायल पर स्थित चर्तुभुज तालाब मे हाथ मे घांस की बनाई लिये अपने हाथो मे घांस की बेल लिये पानी मे अर्पित कर रहे यह लोग दीपावली के मौके पर अपने पुर्वजो को याद कर दीपावली पर्व की शुरूआत करने जा रहे है और इस रस्म को कहते है छांट भरना अर्थात सामान्य भाषा मे इसे श्राद भी कह सकते है क्योंकि गुर्जर समाज के लोग अपने पुर्वजों के श्राद्ध अलग-अलग ना मनाकर दीपावली के दिन एक साथ समाज के लोग खानदान और परिवार के अनुसार एक पंक्तिबद्ध होकर अपने पित्रों के प्रति श्रद्धा जाहिर करते है इस दौरान समाज के लोग अपने-अपने पुर्वजो को खीर के साथ उनके जीवन मे उनकी प्रिय वस्तुओ का भोग भी लगाते है, जिलेभर मे समाज के लोग चतुर्भुत तालाब और अन्य जलस्त्रोतो पर आकर छांट भरने की रस्म की अदायगी कर अपने-अपने पुर्वजो को याद करते है और फिर जाकर उनके लिये दीपावली के त्यौहार की शुरूआत होती है।

दरअसल दीपावली के मौके पर गुर्जर समाज अपने पुर्वजो को याद कर दीपावली पर्व की शुरूआत करते है और इस रस्म को कहते है छांट भरना अर्थात सामान्य भाषा मे इसे श्राद भी कह सकते है क्योंकि गुर्जर समाज के लोग अपने पुर्वजों के श्राद्ध अलग-अलग ना मनाकर दीपावली के दिन एक साथ समाज के लोग खानदान और परिवार के अनुसार एक पंक्तिबद्ध होकर अपने पित्रों के प्रति श्रद्धा जाहिर करते है इस दौरान समाज के लोग अपने-अपने पुर्वजो को खीर के साथ उनके जीवन मे उनकी प्रिय वस्तुओ का भोग भी लगाते है, समाज के लोगो ने बताया कि इस रस्म का उद्देश्य यही है आपके परिवार की बेल का लम्बा करना होता है, इसलिये इस परम्परा को निभाते समय बुजुर्ग से लेकर बुजुर्ग व्यक्ति से लेकर दुधमुंहे नवजाम बालक को भी इसमे शामिल किया जाता है

गुर्जर समाज के कालूराम, हरिराम, रामलाल गुर्जर बताते है कि दीपावली पर छांटभर कर पुजा त्यौहार को अपने-अपने ढंग से मनाने और भारतीय सस्कृती के विभिन्न रंगो को दर्शाती है कि किस तरह हमारी सस्कृती अपने अन्दर कितने रंग समेटे है और गुर्जर समाज द्वारा श्राद्ध करने की यह अनौखी प्रथा इसी का हिस्सा है, जिसमें अपने पूर्वजनों को याद करने और अपनी परम्परा से अपनी नवीन पीढी को जोडने का अनौखा अंदाज देखने को मिलता हैं।

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