March 18, 2019
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पांच माह में दिखाना होगा कमाल ।

By on December 20, 2018 0 78 Views

 

सियासत में पांच महिने बहुत होते हैं। उनमें जीत हार में और हार जीत में बदल सकती है। कहने का मतलब यह है कि कांग्रेस को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में मिली अपनी तीन विजयों को अगले पांच महीनों में बहुत ध्यान से संभालकर रखना होगा। लापरवाही, बेपरवाही, गफलत और इन सबसे ऊपर, अंदरूनी आपस क द्वंद्व, बना-बनाया बेकार सकते हैं। जनादेश बहुत आसानी से बेकार बन सकता है। और इन पांच महीनों के दरमियान यदि कांग्रेस जनता को यह दिखाती है कि वह राहुल गांधी की प्राथमिकताओं के अनुसार बेरोजगारी, खेती की समस्याओं और भ्रष्टाचार का मुकाबला कर रही है। ईमानदारी से, निष्ठा से, तो फिर 2019 के वसंत-ग्रीष्म में होने वाले चुनावों में जीत की उम्मीद रख सकती है। वहीं मतदाता जिन्होंने उनको अपना विश्वास दिया है, देश के अन्य प्रदेशों में भी यदि यह मानसिकता बनती है कि इन तीन प्रदेशों में कांग्रेस ने सुअवसर, संयोग गंवा दिया है, मतदाता के विश्वास को ठूकरा दिया है, तो उन प्रदेशों में भी मायूसी बढ़ सकती है, जो कांग्रेस को डुबो सकती है।

तीन प्रदेशों की जीत ने कांग्रेस के कंधों पर एक अहम भूमिका बैठा दी है। उसे इन तीन राज्यों में अपने शासन को निष्ठावान, समर्पित और जनहित के लिए सक्रिय बनाना होगा। और विशेषकर किसानों के दिल-ओ-दिमाग में उसको एक संज्ञा अपने लिए अपने परिश्रम, अपने हुनर से बनानी होगी। किसानों ने अभी कुछ दिनों में अपनी शक्ति और अपना संगठन दिखाया है। उनका धैर्य और ना सहन कर सकेगा। लोकसभा और राज्यसभा में एक संयुक्त अधिवेशन बिठाना होगा। इसके लिए कांग्रेस को किसानों की इस अनाथक मांग को अपनी मांग बनाकर उसको साकार बनाना होगा। और यदि भाजपा सरकार इस मांग को स्वीकार नहीं करती है तो फिर कांग्रेस और उन सभी दलों को, जिन्होंने नवंबर 30 को दिल्ली मे रैली में भाग लिया था, भारत की उन सभी विधानसभाओं में यही अधिवेशन बिठाना होगा, जिन प्रदेशों में गैर-भाजपा सरकारें आज बैठी हैं। कांग्रेस के आलाकमान को नवंबर 30 की दिल्ली के आयोजकों के साथ अतिशीघ्र एक बैठक में वार्तालाप करना चाहिए, जिसमें किसान संबंधी एक कार्य-सूची बनाई जाए। उसमें किसान-वाणी भी शामिल हो, किसान-सोच, किसान-दर्द सुनाई दे। यह सर्वविदित सत्य है कि विपक्ष का नेता जैसे ही कुर्सी पर विराजमान होता है, तो ब्यूरोक्रेसी उसका स्वागत करते हुए उसके इरादों के दूध में पानी मिला देती है। यह कठिन है, यह व्यावहारिक नहीं, यह पेचीदा है, इस पर कानून तेवर चढ़ाएगा, इसके लिए राशि कहां है? यह तो असंभव है। इस नकारात्मक धुन से कल का विद्रोही और आज का मंत्री चैंक जाता है, घबरा जाता है और जैसे ही उसके उसूलों, उसकी योजनाओं पर पानी बहने लगता है, वैसे ही कल के मंत्री व आज के विद्रोही की आवाज में जोश आने लगता है, रोष बहने लगता है। भूमिकाएं करवट बदलती है।

 

अगले पांच महीने बहुत अहम है। नई तीन सरकारों को कामयाब होना है उन प्रांतों की भलाई के लिए और देश में लोकतंत्र के बचाव के लिए। अच्छे दिन का नारा अपना काम कर गया है अब सच्चे दिनों की बारी है।

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