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कर्ज पर टिका है भविष्य।

By on December 26, 2018 0 31 Views

 

वित्त वर्ष 2017-18 में पहली बार बैंक कर्जो में व्यक्तिगत ऋण की हिस्सेदारी सबसे उच्चतम स्तर पर थी। रिजर्व बैंक के क्षेत्रवार बैंक कर्ज के आंकड़ों के मुताबिक, व्यक्तिगत ऋण, जिसमें घर, वाहन, शिक्षा से संबंधित ऋण शामिल हैं, बढ़ते हुए गैर-खाद्य ऋण का 96 फीसदी था। इसका मतलब है कि काॅरपोरेट जगत के कर्ज लेने में कमी आई है और आज उधार बाजार ज्यादातर नागरिकों द्वारा अपने उपभोग के लिए कर्ज लेने पर टिके हैं। संक्षेप में कहें, तो हम एक ऐसे युग में पहंच गए है, जब हम उधार लेकर अपने सपनों को पूरा करते हैं, जैसा कि अमेरिकी लोग वर्षो से करते आ रहे हैं। काॅरपोरेट सेक्टर द्वारा नए निवेश में सुस्ती ने औद्योगिक ऋण मांग को बुरी तरह से प्रभावित किया है, मुख्य रूप से इसलिए कि बैंक क्रेडिट में हाल की प्रवृत्ति के कारण काॅरपोरेट ने ऋण लेना लगभग बंद कर दिया है और अब बैंकों में खुदरा ऋण ही है जो बढ़ रहा है। इस पृष्ठभूमि में भारतीय कर्ज अर्थव्यवस्था अच्छा कर रही है और बहुत कम या नगण्य वित्तीय जागरूकता वाली युवा आबादी के कारण व्यक्तिगत ़ऋण में बढ़ोतरी समझ में आती है। एक नए टीवी सेट के लिए मात्र दस रूपये का तुरंत भुगतान (डाउन पेमेंट) और अगले बारह महीनों तक कुछ हजार रूपये के भावी भुगतान का प्रस्ताव इतना आकर्षक है कि उसे नजरअंदाज करना मुश्किल है।

सभी तरह के ऋणों में से अल्पकालीन व्यक्तिगत ऋण को ज्यादा तवज्जों मिल रही है। ये कर्ज छुट्टियां बिताने, गैजेट्स और कार खरीदने, घर की मरम्मत करने, वेतन का एक हिस्सा एडवांस में लेने और कई मामलों में तो मौजूदा ऋण चुकाने के खातिर लिए जाते हैं। बैंक बैलेंस और भविष्य में होने वाली कमाई के आधार पर भारतीयों की एक पीढ़ी को आसान कर्ज दिया जा रहा है। इसके अलावा कम समय में उधार लेने की सुविधा ने आबादी के उस हिस्से की मदद की है जो अपनी आकांक्षाएं पूरी करने के लिए बचत को जरूरी नहीं समझते।

डिजिटल मार्केटिंग, बढ़ने रिटेल स्टोर नेटवर्क, आसान आॅनलाइन शाॅपिंग और उधार का खतरा न समझने की प्रवृत्ति ही लोगों को कर्ज लेने के लिए प्रेरित कर रही है, जैसे कि कल होगा ही नहीं। उधारकर्ता का त्वरित मूल्यांकन कर लिया जाता है, जो कि तकनीकी दृष्टि से असुरक्षित है, जिसका अर्थ है कि ऋण का कोई आधार है ही नहीं, मूल्य टैग ज्यादातर अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के बजाय किस्त (ईएमआई) पर होते है। अगर राष्ट्रीय दैनिकों में आॅनलाइन स्टोर और नवीनतम गैजेट के विज्ञापन देंखे, तो इस बात की पूरी संभावना है कि वस्तुओं की कीमत के बजाय उसमें प्रमुखता से ईएमआई का उल्लेख होगा।

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