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क्या संसद बच्चों की तरह बहस करने के लिए है ?

By on December 28, 2018 0 60 Views

 

इन दिनों संसद का सत्र चालू है और दोनों ही सदनों लोकसभा व राज्यसभा में ऐसा माहौल बना हुआ है कि मानों देश के सामने कोई ऐसी समस्या ही नहीं है, जिस पर बहस करके उसका हल निकाला जा सके। इसमें भी राज्यसभा का नजारा रहता है कि यह रोज सुबह 11 बजे बैठती है और कमोबेश अगले दिन के लिए स्थगित हो जाती है। लोकसभा में बैठक शोर शराबे में तो आधे अधूरे दिन किश्तों होती है और सरकार अपने विधेयक भी पारित करा लेती है और राज्यसभा में भेज देती है। सवाल यह नहीं है कि संसद में शोर शराबा क्यों होता है? शोर शराबा होना भी लोकतंत्र के जीवंत होने का प्रमाण होता है, क्योंकि जनता के लिए चुने हुए प्रतिनिधि संसद में देश के लोगों की जुबान होते है। एक-एक लोकसभा सदस्य लाखों लोंगों की जुबान अपने मुंह में लेकर संसद में प्रवेश करता है, लेकिन असली मुद्दा यह है कि उनकी बातों को किस तरह सदन चलाने के नियमों में पिरोते हुए तरतीब से पेश किया जाए। यह जिम्मेदारी लोकसभा अध्यक्ष की होती है और उनका आसन सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के ही दबाव से पूरी तरह मुक्त होता है। इसकी व्यवस्था भी प्रथम लोकसभा अध्यक्ष मावलंकर ने आजादी से पहले ही तय कर दी थी, जब सेंट्रल एसेम्बली की अध्यक्षता किया करते थे। उन्हीं की दूर दृष्टि थी कि उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष की सत्ता को सरकार के प्रभाव से पूरी तरह दूर रखने के लिए नियमावली तैयार की थी, जिसे संवैधानिक स्वरूप दिया गया था, लेकिन फिलहाल मुद्दा यह है कि आज लोकसभा में तीन तलाक विधेयक को पारित करने के लिए विहिप जारी किया है। तीन तलाक पर सरकार ने अध्यादेश जारी किया था, जिसे सदन के इसी सत्र में विधेयक के रूप में पारित करना जारूरी होगा। इस विधेयक का विपक्ष कुछ ऐसे पहलुओं पर कड़ा विरोध कर रहा है, जिसे मुस्लिम महिलाओं के पारिवारिक झगड़ों को फौजदारी मुकदमों में तब्दील किया जा सकता है। शादी या विवाह दो व्यक्तियों के बीच का नितांत निजी मामला होता है, जिससे सरकार का कोई लेना देना नहीं हो सकता। वैसे भी इस्लाम में शादी एक अनुबंध या इकरारनामा होता है जिसकी शर्तों से स्त्री व पुरूष दोनों बंधे रहते हैं। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय पहले ही निर्णय दे चुका है कि किसी भी मुस्लिम स्त्री की शादी केवल इस वजह से खारिज नहीं मानी जाएगी कि उसके पति ने उसे तीन बार तलाक लफ्ज का इस्तेमाल करके बेदखल कर दिया है। उसके सारे जायज हक बाकायदा बने रहेंगे, लेकिन सवाल महिला अधिकारों से जुड़ा हुआ है। ये अधिकार धर्म विशेष के दायरे तक सीमित नहीं किये जा सकते हैं।

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