January 18, 2019
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खरबूज-तरबूज की खेती बर्बाद..

By on July 18, 2018 0 97 Views

आज से लगभग 20 साल पहले बनास के खरबूजे का नाम आते ही मुंह मे पानी के साथ टोंक का नाम स्वत: ही आ जाता था, टोंक की बनास नदी का खरबूजा राजपूताना में नहीं बल्कि देष कई हिस्सों में निर्यात किया जाता था लेकिन समय ने ऐसा मोड लिया कि आज टोंक का खरबूजा अपनी पहचान के साथ अपना वजूद भी खो चुका है,जबकि वर्तमान टोंक मे खरबूजे की मिठास गायब सी हो गई है, जिससें इससे रोजगार पाने वालों से लेकर इसका स्वाद लेने वाले तक इसके इतिहास को बयां करते नजर आते है, आखिर क्या कारण रहे कि टोंक की शान रहा खरबूजा लूप्त हो अपनी मिठास खो चुका है देखते है। भले ही बीसलपूर बांध का भराव राज्य के लोगो के लिये पेयजल लिहाज से वरदान साबित हुआ है, लेकिन आधा टोंक सहित राज्य के कई जिलों की प्यास बुझाने के लिये टोंकवासियों ने अपने सुनहरे इतिहास को गवा दिया है, जी हां हम बात कर रहे दो दषक पूर्व तक टोंक की पहचान रहे खरबूजें की जो भीषण गर्मी में शरीर को ठंडक पहुचाने के काम आते थे, बीसलपुर बांध बनने से पूर्व सालभर बहने वाले बनास नदी से पैदा होने वाला खरबूजांे देष-विदेष मे टोंक को नाम देता था, जबकि दिल्ली मे तो टोंक के नाम से खरबूजा बैचा जाता है, लेकिन बीसलपुर बांध बनने के बाद से बनास नदी मे कम हुई पानी की आवक से नदी सालभर सुखी रहने लगी और नदी सुखने के बाद खनन माफियाओं की नजर बजरी पर ऐसी पडी कि बजरी के अंधाधुंध अवैध खनन ने मिट्टी की नमी को खत्म कर दिया, जिससे खरबूजें की मिठास की भी खत्म हो गई,  बीसलपुर बांध बनने से पूर्व उगने वालो खरबूजे की खासियत थी यही मिठास, जो आज बाजारों मे लगे ठेलों मे बिचने वाले खरबूजों नहीं मिलती, क्योंकि वो मिठास बनास के पानी ओर मिटटी की बदोलत थी, ऐसे में जहा इनकी मिठास पर इसका असर पडा है भले ही मंहगे भाव मे बिकते खरबुजे को खाना भी अब गरीब के बस मे नजर नही आता है। यह कडवा सच यहां के निवासियों के दिल को हमेषा कचोटता है कि नवाबी नगरी को राज्य से बाहर पहचान देने वाले खरबूजें की मिठास अब बीते समय की बात हो गई है, टोंक मे खरबूजें की खेती कर अपने परिवार चलाने वाले सैंकडो परिवार जहां अब मजदूरी कर अपना पालन-पोषण करने का मजबूर है, तो यहां मीठे खरबूजें की मिठास की कहानी बयां करने वाले भी खूब है, लेकिन यहां खरबूजें की खेती करने वाले हजारों लोग खरबूजे की खेती से महरूम हो गये, सबसे ज्यादा असर खरबूजे की खेती पर हुआ, क्योंकि बांध के बनने के बाद दो दषक से खरबूजों की मिठास खत्म हो गई।

 

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