March 20, 2019
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एक नजर आवां के दडे पर।

By on January 14, 2019 0 98 Views

 

टाट से बना 70 किलो वजनी दड़ा, रंग-बिरंगी पोषाकों से सरोबार चार-पांच हजार खिलाड़ी, मकानों की छतों पर बैठी हूटिंग करती ग्रामीण महिलाएं, दो गोल पोस्ट, देश-विदेश से आए सैलानी एवं मीडिया वालों का जमघट। कुछ इस तरह का नजारा देखने को मिलेगा मकर संक्रान्ति के उत्सव पर उपतहसील के आवां कस्बे के गोपाल जी भगवान मन्दिर के चैक में, जहां रियासतकाल से चली आ रही परम्परा का उनके वंशज आज भी बखूबी निभाते आ रहे हैं। इस खेल के माध्यम से रणबांकुरों की खोज रियासतकाल में की जाती थी। आवां का ‘दड़ा‘ अब राज्य की लोककला एवं संस्कृति का प्रतीक बन चुका है। मकर संक्रान्ति के दिन 70 किलों दड़े को खेलने जहां आवां के गोपाल जी भगवान के मन्दिर चैक में आस-पास के बारहपूरों के वासियों सहित क्षेत्र के हजारों खिलाड़ी सजधज कर खेलने के लिए तैयार रहते हैं, वहीं खिलाडियों का उत्साह बढ़ाने के लिए महिलाएं व बच्चे मकानों की छतों पर बैठकर आवाजें लगाते नजर आते हैं। यह खेल आवां कस्बे में हर वर्ष मकर संक्रान्ति को खेला जाता है, जिसे हर साल खेल खत्म होने पर कुएं में डाल दिया जाता है और फिर अगले वर्ष मकर संक्रान्ति उत्सव से तीन-चार दिन पूर्व निकालकर सूखा लिया जाता है। फिर से पुनः टाट में लपेट कर मोटी रस्सी से सिलाई कर तैयार किया जाता है, जिसे मकर संक्रान्ति के दिन गोपाल जी के चैक में रखा जाता है। यह खेल दोपहर करीब 12 बजे शुरू होकर 3 बजे समाप्त हो जाता है। इस दड़े को देखने आवां के आस-पास बसे गुर्जर बाहुल्य बारहपुरा के बाशिंदे आते हैं, जो स्वतः ही क्षेत्र के हिसाब से छह-छह गांवों में विभाजित होकर अपनी टीम बना लेते हैं। इस खेल की खास बात यह है कि रियासतकाल के खेल की शुरूआत उनियारा दरबार के रावराजा सरदार सिंह के वंशज ही ठोकर मारकर करते हैं। गांव में दो ‘गोल पोस्ट‘ बने हुए हैं। एक और अखनिया दरवाजा है, तो दूसरी और दूनी दरवाजा। आवां के चारों तरफ बसे पहाड़ी इलाकों के बारह गांव बटे हुए हैं। आवां में आने वाले छह गांवो के ग्रामीणों को दूनी दरवाजे से, तो छह गांवों के ग्रामीणों को अखनिया दरवाजे की ओर से आना पड़ता है। दूनी दरवाजे की ओर से आने वाले ग्रामीण दडे़ को अखनिया दरवाजे की ओर ले जाने की मशक्कत करते है, जबकि बाकी छह गांव के लोग उसे दूनी दरवाजे की और धकेलते हैं।

जानकारी के अनुसार उनियारा दरबार रावराजा सरदार सिंह अपनी रणबाकुरों की खोज ‘दड़ा‘ खेल के माध्यम से किया करते थे। आवां का दड़ा आज अन्तरराष्ट्रीय मीडिया में छा चुका है। इस खेल को कवरेज करने के लिए कई टी. वी. चैनल व प्रिंट मीडिया के पत्रकार 13 जनवरी को ही आवां कस्बे में अपना डेरा डाल देते हैं, ताकि खेल का पूरा कवरेज एवं उससे सम्बन्धित पहलुओं की जानकारी हासिल कर सके। दडे़ की हार-जीत से क्षेत्र में अकाल और सुकाल का अनुमान भी लगाया जाता है। यदि दड़ा अखनिया दरवाजे की तरफ चला जाए, तो क्षेत्र में अकाल पड़ने की सम्भावना होती है और दड़ा दूनी दरवाजे की तरफ आ जाए तो, ग्रामवासी इसे अच्छा शगुन मानते हैं।

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