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आन बान शान की प्रतीक पाग-पगड़ियां

By on October 30, 2018 0 116 Views

राजस्थान की संस्कृति में पहनावा और खानपान विश्वस्तर पर अपनी अनूठी पहचान बना चुका है। यहां साफा, पाग और पगड़ी का एक विशेष आकर्षण और सांस्कृतिक महत्व है। प्राचीनकाल से लकर वर्तमान काल तक इस परिधान की यात्रा अनवरत है। राजस्थान में ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न अंचलों में इनके धारण करने में मौलिक अंतर अवश्य है परंतु इसकी मूल आत्मा सवंत्र समान रही है। पाग-पगड़ी की शुरूआत कब और कहां हुई इस संबंध में कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है परंतु सिंधुघाटी की सभ्यता, अजंता के भित्तिचित्रों, प्राचीन मूर्तियां, चित्रों और अरबी पांडुलिपियों में इसके प्रमाण उपलब्ध होते है। राजस्थान की संस्कृति में इसके प्रचलन में आने के बाद इसने अपना विशिष्ट स्थान बनाया। सिर पर साफा या पगड़ी के पीछे मूल भावना यहीं हो सकती है कि इसके कारण राजस्थान की तेज गर्मी और सर्दी से बचा जा सके। राजस्थान में इनके बांधने के लगभग चार सौ तरीके हैं और यह राजपूूती आन-बान की प्रतीक भी रही है। पगड़ी को जब राज्यश्रय प्राप्त हुआ तब इसकी प्रतिष्ठा में काफी वृद्धि हुई। राजा-महाराजाओं के यहां विशिष्ट व्यक्ति हुआ करते थे जो पगड़ी बांधने के कई तरीके जानते थे। पगड़ियों की शान कलंगियो और आभूषणों ने और भी बढ़ाई थी। पगड़ियों पर रत्नभूषण टांकने का श्रेय उदयपुर के महाराणा उदयसिंह को जाता है। जयपुर की पगड़ी खातेदारी और सलीमशाही कहलाने लगी तो देवगढ़ की पगड़ी जसवंतशाही। इन्हें प्रमुखरूप से तीन प्रकार से बाटां जाता है- साफा, पगड़ी, और पाग। साफा और पगड़ी लगभग नौ मीटर लंबे और चार फुट चैड़े कपड़े के होते है और पाग अठारह मीटर लंबे और पौन फुट चैड़े कपड़े की होती है। पाग में कपड़े को बांटकर लपेटा जाता है। राजस्थान में धर्म, जाति, क्षेत्र और परंपरा के अनुसार इनके अलग-अलग नाम है। यदि हाथ भर का कपड़ा सिर पर बांधा जाता है तो उसे चिंदी कहा जाता है। इसके अलावा इनके अनेक नाम प्रचलित है जैसे फालिया, फैंटा, सेला, लपेटा, पोतिया, अमला और षिरोत्राण। ऋतुओं के अनुसार भी पाग-पगड़ियों का चयन किया जाता है। बंसत में गुलाबी, वर्षा में लाल चंदन, ग्रीष्म में हल्की गुलाबी, शरद में गुल-ए-अनार, हेमंत मंे विभिन्न रंगों का मोलिया और शिशिर में केसरिया रंग की पाग-पगड़ियों को बांधा जाता है। इसी प्रकार हर माह के लिए भी अलग पगड़ी बांधने की परंपरा है। त्यौहारों, उत्सव और रीतिरिवाजों में भी अलग पगड़ियां पहनी जाती है। जाति विशेष के आधार पर भी पगड़ी बांधने की परंपरा है जिससे उसकी जाति का ज्ञान किया जा सकता है। पाग-पागडियों का लोकजीवन पर काफी प्रभाव रहा है। आत बोलचाल की भाषा, मुहावरों, कहावतो तथा लोकगीतों में भी इसके महत्व का विवरण मौजूद है। राजस्थान के समाज में ये मान-सम्मान की प्रतीक रही हैं। रक्षाबंधन के दिन बहन अपने भाई को मोठड़ी साफा बांध कर उसे सम्मानित करती है। घर में मृतयु हो जाने पर सफेद रंग का साफा बांधा जाता है तथा बाहरवें दिन गुलाबी रंग का साफा बांधा जाता है। ये सभी रीति-रिवाज और परंपराओं के अनुकूल बांधे जाते है। इनकी महत्ता इसी से जानी जा सकती है कि युद्धभूमि में वीरगति प्राप्त पति के शव की पहचान उसकी पगड़ी से ही की जा सकती थी और उस पगड़ी के साथ ही पत्नि सती हो जाया करती थी। पगड़ी को लेकर एक ओर बात है जिससे सभी देशवासियों का सर गर्व से ऊंचा होगा कि एक बार स्वामी विवेकानन्द ने शिकागों (अमेरिका) में राजस्थानी पगड़ी पहन कर विश्व धर्म सम्मेलन को संबोधित किया था। उस सम्मेलन में हजारों के सामने स्वामी विवेकानंद की पगड़ी मुख्य आकर्षण का केन्द्र रही थी।

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