March 22, 2019
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सियासी घमासान लेकर आएगा 2019 ।

By on December 29, 2018 0 89 Views

 

यह याद दिलाने के जरूरत नहीं कि आने वाला साल लोकसभा चुनाव का है। यह चुनावी साल इसलिए और अनोखा होने वाला है, क्योंकि एक पाले में भाजपा जैसी शक्ति खड़ी है जिसके लिए जीत की कोई सीमा नहीं है और जो हर पराजय को जीत का आधार बनाती है तो दूसरे पाले में कांग्रेस के साथ ऐसी छोटी-बड़ी राजनीतिक ताकतें एकजुट हो रही है, जिनके लिए यह करो या मरो का क्षण है। इनके पास तीन राज्यों में जीत की संजीवनी भी है। स्पष्ट है कि 2019 कई मायनों में बहुत रोचक होने वाला है। विदाई के मोड़ पर खड़ा 2018 राजनीतिक रूप से बहुत अहम रहा, खासकर भाजपा के लिए। उसने उत्तर-पूर्वी राज्य त्रिपुरा में वाम दलों को परास्त कर यह संदेश दिया कि भाजपा का विजय रथ रूकने वाला नहीं। कर्नाटक में कांग्रेस और जद (एस) के कौशल से भाजपा को मुंह की खानी पड़ी, लेकिन उसके नैतिक बल में कोई कमी नहीं आई। यह संदेश मुखर होकर उभरा कि भाजपा को सामान्य स्थिति में नहीं हराया जा सकता है। हाल के विधानसभा चुनावों से भी यह बात पुष्ट हुई कि भाजपा से मुकाबला कर उसे परास्त करना कठिन है, पर हार हार होती है और भाजपा के लिए ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि जिस कांग्रेस से भारत को मुक्त करने की बात हो रही थी, उसने तीन राज्यों में भाजपा को मुक्त कर दिया। दिल बहलाने के लिए कई तर्क हो सकते हैं कि छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश में भाजपा को 15 साल की सत्ता विरोधी लहर से जूझ रही थी और राजस्थान में स्थानीय नेतृत्व के प्रति असंतोष था, पर जीत तो जीत ही होती है। इस जीत ने पस्त पड़ चुकी कांग्रेस में एक नई जान फंूक दी है। वहीं दूसरी ओर भाजपा के अंदर मोदी-शाह विरोधी तत्वों को भी सिर उठाने का मौका मिल गया है। जहां हिंदी पट्टी के इन राज्यों ने भाजपा के लिए एक नई चुनौती पैदा की, वहीं सुदूर उत्तर-पूर्व के मिजोरम और दक्षिण के तलंगाना में कांग्रेस को मिली करारी हार ने उसके देशव्यापी पुनर्जीवन का तर्क बनाने वालों के उत्साह को एक सीमा में रखा। यह कहना अनुचित नहीं कि हर चुनाव का फ्लेवर अलग होता है और विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव में बहुत अंतर होता है। उदाहरण के तौर पर 2003 में ये तीनों राज्य जीतने के बाद 2004 में भाजपा आम चुनाव हार गई थी। इसी तरह 1984 में कांग्रेस ने आम चुनावों में ऐतिहासिक सफलता पाई, परंतु उसके तुरंत बाद हुए कर्नाटक चुनाव में हार गई। इस साल विपक्ष ने राफेल को आधार बनाकर मोदी सरकार को भ्रष्टाचार में घेरने की खूब कोशिश की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस मु६े की हवा निकल गई। इसी तरह जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स कहकर राहुल गांधी ने सारे देश मे मोदी सरकार को आड़े हाथ लिया, परंतु अभी हाल में वित्त मंत्री जेटली ने तमाम वस्तुओं को 18 फीसदी जीएसटी के दायरे के अंदर लाकर इस मु६े पर सरकार की छवि को बेहतर किया। इसके बावजूद जीएसटी से भाजपा का समर्थक रहा व्यापारी वर्ग खासकर लघु एवं मध्यम उद्योग से जुड़े लोग अभी भी नाराज हैं। इन्हें संतुष्ट करने के लिए सरकार को जीएसटी रिफंड मु६े पर शीघ्र फैसला लेना पड़ सकता है। पिछले कुछ समय से किसान की स्थिति बड़ा मु६ा है। हालांकि फसल बीमा योजना, लागत का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य, नीमयुक्त यूरिया आदि द्वारा मोदी सरकार ने किसानों को राहत देने की कोशिश की, परंतु कांग्रेस द्वारा लगातार किसान कर्ज माफी के वादे ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा का काफी नुकसान किया है। हालांकि कर्ज माफी किसान हित का स्थायी मार्ग नहीं, परंतु भाजपा को कांग्रेस के इस विमर्श की काट सोचनी होगी। आगामी आम चुनाव में भाजपा प्रधानमंत्री मोदी की सशक्त छवि को लेकर चुनावी रण में उतरेगी, जिसे चुनौती देने के लिए तीन राज्यों में जीत से उत्साहित राहुल गांधी होंगे। यह बात और है कि संयुक्त विपक्ष के नेता बनने के लिए राहुल गांधी को अभी भी काफी मशक्कत करनी पड़ेगी।

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