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अटल के मन का पहला विषय ‘राजनीति’ नहीं था।

By on December 25, 2018 0 42 Views

 

भारत के राजनीतिक इतिहास में अटल बिहारी वाजपेयी का संपूर्ण व्यक्तित्व शिखर पुरूष के रूप में दर्ज है। दुनिया में उनकी पहचान एक कुशल राजनीतिक, प्रशासक, भाषाविद्, कवि, पत्रकार व लेखक के रूप में है। संघी विचारधारा में पले बढ़े अटल जी बड़ी उदारता के साथ अपने से ऊंचा नहीं होने दिया। राजनीति में उदारवाद और समता एवं समानता के सबसे बड़े समर्थक माने जाते हैं। विचारधारा की कीलों से कभी अपने को नहीं बांधा। राजनीति को दलगत और स्वार्थ की वैचारिकता से अलग हट कर अपनाया और उसको जिया। जीवन में आने वाले हर विषम परिस्थितियों और चुनौतियों को स्वीकार किया। नीतिगत सिद्धांत और वैचारिकता का कभी कत्ल नहीं होने दिया। राजनीतिक जीवन के उतार चढ़ाव में उन्होंने आलोचनाओं के बाद भी अपने को संयमित और तटस्थ रखा। राजनीति में धुर विरोधी भी उनकी विचारधाराओं और कार्यशैली के कायल थे। लेकिन पोखरण जैसा आणविक परिक्षण कर तीसरी दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के साथ दूसरे मुल्कों को भारत की शक्ति का एहसास कराया।यों की पहचान बाद में हुई और भाजपा सरकार में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। आपातकाल के दौरान डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की श्रीनगर में मौत के बाद सक्रिय राजनीति में दखल दिया। हालांकि उनके राजनीतिक बाद में हुई और भाजपा सरकार में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

संघ के संस्थापक में एक अटल ने 1951 में संघ की स्थापना की थी। अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर में 25 दिसंबर 1924 को हुआ था। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी शिक्षक थे। उनकी माता कृष्णा जी थी। वैसे वे मूलतः उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के बटेश्रवर गांव के रहने वाले थे। लेकिन पिता जी मध्य प्रदेश में शिक्षक थे। इसलिए उनका जन्म वहीं हुआ। लेकिन उत्तर प्रदेश से उनका राजनीतिक लगाव सबसे अधिक रहा। प्रदेश की राजधानी लखनऊ से वे सांसद थे। जबकि उन्हें श्रेष्ठ सांसद और लोकमान्य तिलक पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। कविताओं को लेकर उन्होंने कहा था कि मेरी कविता जंग का एलान है। पराजय की प्रस्तावना नहीं। वह हारे हुए सिपाही का नैराशय-निनाद नहीं, जूझते योद्धा का जय संकल्प है। वह निराशा का स्वर नहीं, आत्मविश्वास का जयघोष है। उनकी कविताओं का संकलन ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ खूब चर्चित हुई जिसमें हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगाज्खास चर्चा में रही। राजनीति में संख्या बल का आंकड़ा सर्वोपरि होने से 1996 में उनकी सरकार सिर्फ एक मत से गिर गई और उन्हें प्रधानमंत्री का पद त्यागना पड़ा। यह सरकार सिर्फ तेरह दिन तक रही। बाद में उन्होंने प्रतिपक्ष की भूमिका निभायी। इसके बाद हुए चुनाव में वे दोबारा प्रधानमंत्री बने। संख्या बल की राजनीति में यह भारतीय इतिहास के लिए सबसे बूरा दिन था। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी विचलित नहीं हुए उन्होंने इसका मुकाबला किया। 16 मई से 01 जून 1996 और 19 मार्च से 22 मई 2004 तक वे भारत के प्रधानमंत्री रहे। 1968 में 1973 तक जनसंघ के अध्यक्ष रहे।

राजनीति के शिखर पुरूष अटलजी मानते हैं कि राजनीति उनके मन का पहला विषय नहीं था। राजनीति से उन्हें कभी-कभी तृष्णा होती थी। लेकिन वे चाहकर भी इससे पलायन नहीं हो सकते थे। क्योंकि विपक्ष उन पर पलायन का मोहर लगा देता। वे अपने राजनैतिक दायित्वों का डट कर मुकाबला करना चाहते थे। यह उनके जीवन संघर्ष की भ खूबी रही। वे एक कुशक कवि के रूप् में अपनी पहचान बनाना चाहते थे। लेकिन बाद में इसकी शुरूआत पत्रकारिता से हुई। पत्रकारिता ही उनके राजनीतिक जीवन की आधारशैली बनी। उन्होंने संघ के मुखपत्र पांचजन्य, राष्ट्रधर्म और वीर अर्जुन जैसे अखबारों का संपादन किया। अपने कैरियर की शुरूआत पत्रकारिता से की। 1957 में देश की संसद में जनसंघ के सिर्फ चार सदस्य थे। जिसमें एक अटल बिहारी वाजपेयी थे। संयुक्तराष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए हिन्दी में भाषण देने वाले अटलजी पहले भारतीय राजनीतिज्ञ थे।

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