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घटते शेरों की संख्या में गुजरात सरकार कि अनेदेखी।

By on October 8, 2018 0 66 Views

वायरस के बारे में 7 साल पहले ही सरकार को चेतावनी दे दी गई थी।

2011 में बेंगलुरु की सेंटर फॉर एनिमल डिसीज रिसर्च एंड डायग्नोसिस ने सूचना दी थी।

विश्व में ऐतिहासिक शेरों के लिए पहचाने जाने वाले गुजरात राज्य में स्थित गिर के जंगल में अचानक कुछ दिनों में जैसे शेरों को शाप लग गया हो। पिछले कुछ दिनों में एक के बाद एक लगातार 22-23 शेरों की अचानक मौत हो गई। डाॅक्टरों की रिपोर्ट की माने तों इसमें सरकार की एक बड़ी लापरवाही सामने आई है, जिसमें उसने 7 साल पहले की रिपोर्ट को हल्के में ले लिया। यदि इस रिपोर्ट पर गौर किया जाता तो शायद आज जंगल में इतने ज्यादा शेरों की मौत न होती।

कुत्तों की लार से होने वाले ब्क्ट वायरस की दी थी जानकारी-

गुजरात सरकार ने अब जाकर यह माना है कि शेरों की मौत का वजह केनाइन डिस्टेम्पर वाइरस के कारण हुई है। ऐसे में बेंगलुरु की सेंटर फॉर एनिमल डिसीज रिसर्च एंड डायग्नोसिस द्वारा गुजरात सरकार को केनाइन डिस्टेम्पर वाइरस के बारे में चेतावनी दी थी। इसके बाद भी सरकार ने उस रिपोर्ट को गंभीरता से नहीं लिया। यही वजह है कि आज शेरो के गढ के नाम से पहचाने जाने वाले गुजरात ने अपने 23 शेरों को खो दिया है।

कैसे फैलता है ब्क्ट वायरस-

कुत्तों की लार से निकलने वाले वाइरस से फैलने वाला यह रोग वन्य जीवों के लिए बहुत बड़ा खतरा है। इंसानों में जिस वाइरस के कारण ब्रोंकाइटिस जैसे रोग फैलते हैं, उसी कुल के इस वाइसर से प्राणियों का जीवन खतरे मेें पड़ जाता है। सांस लेने के दौरान यह रोग प्राणियों में फैलता है। एक सप्ताह बाद उसके लक्षण दिखाई देते हैं। एक सप्ताह तक इलाज ने होने से यह वाइरस बहुत ही तेजी से फैलता है। जिससे प्राणी की मौत हो जाती है।

लक्षण: ब्क्ट वाइरस से ग्रस्त होने के बाद प्राणियों के शरीर में सुस्ती देखी जाती है। जिससे उनमें सक्रियता कम हो जाती है। आंखें दर्द करने लगती हैं, उसमें लालिमा दिखाई देती है। तीन से पांच दिनों के दौरान तेज बुखार आता है। थोड़ी दूर चलने पर ही वह हांफने लगता है। इन लक्षणों के दौरान उसे इलाज न मिला, तो उसका असर पाचन तंत्र और खून के प्रवाह में होता है। इसके बाद वाइरस का असर मस्तिष्क तक पहुंच जाता है और प्राणी की मौत हो जाती है।

ये क्षेत्र भुगत चूके इस प्रकार के वायरस का नुकसान

सन् 1802 में अफ्रीका के घने जंगलों में अधिकांश प्राणियों की मौत इस वाइरस से हुई थी। तब एडवर्ड जेनर ने पहली बार इस रोग के लक्षणों का वर्णन किया था। इसके बाद भी इस वाइरस से निपटने के लिए किसी दवा का आविष्कार नहीं हुआ। इसलिए पूरे विश्व में इस वाइरस से हजारों वन्य प्राणियों की मौत हुई। 1977 में अमेजन में इस वाइरस ने हाहाकार मचाया था। इसके बाद 1991 में तंजानिया में इस रोग ने अपना प्रभाव दिखाया था। इससे वहां के 20 प्रतिशत वन्य जीवो की मौत हो गई थी। इसमें 1000 से अधिक अफ्रीकन शेरों का सफाया हो गया था।

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