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घर के आँगन में ही दफनाने की परम्परा ।

By on August 29, 2018 0 74 Views

 

 घर के आँगन में ही होता है अंतिम संस्कार 

एक समाज में परम्परा है घर में अंतिम संस्कार की …..?

 मौत के बाद भी दो गज जमीन के लिये संघर्ष ।

भारत विभिन्न परम्पराओ ओर प्रथाओं वाला देश है और जानकर हैरानगी भी होती है कि आज भी देश मे कई ऐसी परम्पराए है जिन्हें जानकर हैरानी होती है ऐसी ही एक प्रथा है नाथ सम्प्रदाय में मौत के बाद मृतको की समाधि बनाने की ओर श्मशानों में जगह नही होने के चलते आज नाथ सम्प्रदाय के लोग घरों में ही अन्तिम संस्कार करके समाधिया बनाने को मजबूर हैं।
मौत के बाद मृतको की समाधि अपने घरों में बनाने की परंपरा के बाद घर में ही दफनाना पड़ता है नाथ सम्प्रदाय के लोगो घरों में यहाँ क्योंकि नहीं है कोई और ठिकाना , ये कहानी सुनकर शायद आप यकीन नहीं कर पाएँ लेकिन ये इस देश के एक समाज की हकीकत है और घर में मुर्दे को दफ़नाना उनकी मजबूरी।
ये सुन कर ही आप सिहर उठे होंगे की क्या अपने घर में भी कोई अंतिम संस्कार कर सकता है,,।जी  हाँ लेकिन ये हकीकत है
और किसी एक परिवार के जीवन का सच नहीं है बल्कि सैकड़ों परिवारों की हकीकत है घर में समाधि का खौफनाक सच। सामाजिक मजबूरी की सबसे बड़ी ये कहानी है नाथ सम्प्रदाय के लोगों की जिनके समाज में मौत के बाद समाधि देने की पंरपरा है ।लेकिन मुक्तिधामों में उन्हें समाधी बनाने नहीं दी जाती है ,,लोगों द्वारा विरोध किया जाता है। जिसकी वजह से  मौत के बाद अपने ही घर पर अंतिम संस्कार कर समाधि बनाने को मजबूर है ये नाथ सम्प्रदाय के लोग।
तस्वीरों में दिख रही ये समाधी है लाडपुरा के कर्बला इलाके में रहने वाले दयाशंकर योगी की जिनकी मौत वर्ष 2010 में हुई जिनकी मौत के बाद जब कहीं और उन्हें दफ़न करने की जगह नहीं मिली तो परिजनों ने उनका अंतिम संस्कार अपने ही घर के आँगन में करते हुए समाधी बना दी । जिस पर शिवलिंग की स्थापना भी की गयी है। वहीँ ये तस्वीरें है समाज के एक अन्य परिवार की जिसमे घर के अंदर एक खुले हिस्से में  दादा -दादी और एक तरफ उनके पूर्वजों की समाधी है बनी हुई है जब इनकी मौत हुई तो परिजनों ने अपने घर में ही इनका अंतिम संस्कार कर दिया और इन्हें घर के अंदर ही समाधी दे दी। समाधियों के ऊपर शिवलिंग की स्थापना की गयी है। नाथ सम्प्रदाय के लोग शिव के उपासक माने जाते है और इसीलिए उनकी समाधियों पर शिव परिवार की स्थापना करने की मान्यता है।
कोटा में नाथ समाज के लगभग प्रत्येक घर में पूर्वजों की ऐसी समाधियाँ देखि जा सकती है।जिन घरों में जगह नहीं उनमें तो कमरों तक में ये समाधियाँ  बनायीं गयी  है।
कुन्हाड़ी ,लाडपुरा, और बोरखेड़ा इलाके में इन योगी समाज के लोगों की ऐसी कई समाधियां है जो घरों में है।
 घर में मुर्दे का अंतिम संस्कार करने पर इलाके के लोगों का प्रतिशोध भी इस समाज के लोगों द्वारा झेलना पड़ता है। मौहल्ले के लोगों  घर में मुर्दे को दफ़न करने का विरोध  करते है कई बार हालात झगडे तक पहुँच जाते है लेकिन समाज के इन लोगों को उस वख्त  पीड़ा का दोहरा दंश झेलना  पड़ता है।एक तरफ तो परिजन की मौत का सदमा तो दूसरी तरफ अंतिम संस्कार की जगह न होने से अपने ही घर में दफनाने की बात पर इलाके के लोगों से उस वख्त झगड़ना। लेकिन  नाथ सम्प्रदाय के लोगों की ये  मजबूरी ही कही जा सकती है क्योंकि उन्हें तो अपने परिजन का अंतिम संस्कार करना ही है बाहर जगह नहीं है तो फिर घर में ही सही।
कई जगह तो तंग आकर समाज के लोग धर्माणतारण तक कर चुके है।
साथ ही  योगी समाज के लोगों की कोटा में पचास हजार जनसँख्या।है ऐसे में इन्हें आने वाले वख्त की चिंता भी सताती है।
ये कहानी विकास की इबारत लिखने का दावा करने वाली तमाम सरकारों को शर्मसार कर देंने वाली है,,,,,मानवता को झकझोर देने वाली है। घरों में मौजूद अंतिम संस्कार की ये निशानिया ,,,ये समाधियाँ इंसानी क्रूरता की कहानी को बयां करने के लिए काफी है क्योंकि भारत देश को
संस्कृति प्रधान माना जाता है लेकिन धर्म और संस्कृति के देश में एक समाज इतने हाशिये पर है की मौत के बाद भी दो गज जमीन के अपने हक़ के लिए संघर्ष कर रहा है और अपने धर्म से दूर होने को मजबूर है।
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