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राजा मुचकंदेश्वर और सिंदूरी चौला

By on August 7, 2018 0 118 Views

टोंक (कमलेश कुमार महावर) 

कहते है ईश्वर के कई रूप होते है और वह घट-घट मे निवास करते है, भगवान षिव का रूप वैसे तो जगजाहिर है लेकिन षिवलिंग के रूप मे उनके हजारों रूप है, जिनके बारे अलग-अलग कहानियां जुडी है, कहते है षिव के प्रतिरूप षिवलिंग पर सिंदूर नही चढाया जाता है, लेकिन टोंक मे भी ऐसा षिवलिंग है जहां पूजा से पूर्व षिवलिंग पर चढता है सिंदूरी चौला, टोंक के मौजूद हजारों साल पूराने इस मन्दिर का सही इतिहास का तो आज तक किसी को पता नही लेकिन कहते है खेडा सभ्यता के समय बने इस मन्दिर मे मौजूद षिवलिंग भगवान श्रीकृष्ण के जीवनकाल के समय का हैं।

महादेव के प्रिय महीने सावन में देशभर में  श्रध्दालु अलग-अलग तरीके से उनका अभिषेक और पूजा का उन्हें खुश करने की कोशिश करते  हैं लेकिन टोंक जिले मे नगरफोर्ट की तलहटी पर मौजूद राजा मुचकंदेश्वर महादेव विश्व का एक मात्र ऐसा शिवलिंग है जिस पर सिंदुरी चौला चढ़ाया जाता है। प्राचीन खेड़ा सभ्यता के टीलों के दक्षिण में नगर-नैनवां-देवली मार्ग पर स्थित प्राचीन राजा मुचकंदेश्वर महादेव मंदिर पर कोटेनुमा है। मंदिर की दीवारों की बनावट इसकी प्राचीनता की साक्षी है। मंदिर के गर्भगृह में विराजमान करीब साढ़े चार फीट ऊंचा व करीब ढाई फीट व्यास वाला विशाल शिवलिंग है, जो बालू रेत का बना हआ है हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार देवी, हनुमान, भैरव एवं अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के सिंदुर (कामी) का चौलां चढ़ाया जाता है। लेकिन मुचकंदेश्वर महादेव विश्व का एकमात्र ऐसा शिवलिंग है जिस पर सिंदुरी चौलां चढ़ाया जाता है। मुचकंदेश्वर महादेव के दर्शन करने के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु आते है और सावन मास में यहां हमेशा श्रद्घालुओं तांता लगा रहता है तथा पूजा-अर्चना और अभिषेक का दौर चलता है और लोगो का इससे खास जुडाव हैl

यहां के बारे प्रसिद्ध है राजा मुचकंदेश्वर महादेव अपने भक्तों की मनोकामना का पूर्ण करते है तथा उन्हे मनवांछित फल देते है। मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग के ठीक बाएं में सेन समाज के आराध्यदेव श्यामजी महाराज की प्रतिमा भी विराजमान है, जिस पर भी सिंदुर का चौला चढ़ाया जाता है। श्रीमद भागवत महापुराण के दशम स्कंध में राजा मुचकंद का वर्णन मिलता है। राजा मुचकंद इक्ष्वांकुवंशी राजा मांधाता के पुत्र थे। सतयुग में देवासुर संग्राम में राजा मुचंकद ने असुरों के विरूद्घ देवताओं सहयोग। युद्घ में जीत के पश्चात देवराज इंद्र ने राजा मुचकंद से कहा कि पृथ्वी पर आपका युग समाप्त हो गया है और इस समय द्वापर चल रहा है। आप अपना इच्छित वरदान मांगिये। इस पर राजा मुचकंद ने युद्ध में थक जाने के कारण आराम करने वरदान इंद्र से मांगा। देवराज इंद्र द्वारा वरदान दिया कि आपकी नींद में जो बाधा डालेगा वह नैत्राग्नि से जल कर राख हो जाएगा। उधर भगवान श्रीकृष्ण-काल यवन बीच युद्ध चल रहा था। भगवान कृष्ण रणछोड़ कर भाग गए। तो काल यवन भी उनका पिछा करने लगी। कृष्ण दौड़ते हुए जिस गुफा में राजा मुचकंद शयन कर रहे थे तथा राजा मुचकंद को अपना पिताम्बर औढ़ा कर छिप गया। जैसे ही काल यवन में राजा मुचकंद को कृष्ण समझ कर लात मारी उनकी नींद खुल गई और काल यवन जल कर राख हो गया। इस गुफा में भगवान कृष्ण ने राजा मुचकंद को चतुभुर्ज रूप का दर्शन कराया, वर्तमान यहां सावन के महिने मे खास आकृर्षण देखने को मिलता है और लोग यहां षिव की कृपा के लिये पहुंचते है।

ऐसी मान्यता है कि राजा मुचकंद शिव भक्त थे तथा प्रतिदिन नदी के किनारे बैठकर बालू का शिवलिंग बनाकर पूजा किया करते थे। यहीं पर भगवान शिव ने उन्हे दर्शन दिये एवं उनके द्वारा बनाए गए शिवलिंग का नाम मुचकंदेश्वर महादेव पड़ा। मुचकंदेश्वर का शाब्दिक अर्थ भी मुचकंद के ईश्वर होता है। मंदिर के गर्भगृह में राजा मुचकंदेश्वर महादेव ठीक बगल में भगवान विष्णु की प्रतिमा है, पुरातत्व के विभाग के अधीन होने के बावजूद यह मन्दिर के बारे ज्यादा भले ही नही जानते है लेकिन जो जानते है वह मानते है कि क्योंकि भारत एक धर्म प्रधान देश है और लोगो आस्था हमेषा ईष्वर के इर्द-गिर्द घुमती और लोगो की इच्छा और मनोकामनाये यहा पूरा होती यह लोगो  मानना हैl

पुरातत्व विभाग अधीन आने वाले इस क्षेत्र मे मौजूद इस मन्दिर की खास स्थान है षिवलिंग के पास सेन समाज द्वारा आराध्य देव श्याम जी महाराज के की प्रतिमा विराजित है। मुचकंदेश्वर महादेव के साथ श्यामजी महाराज के भी सिंदुर का चौळां चढ़ाया जाता है। राजा मुचकंदेश्वर महादेव के पुजारी का कहना है कि श्रद्धालूु अपनी इच्छा के अनुसार राजाजी के सवा किलों से लेकर सवा पांच किलों तक कामी का चौला चढ़ाया जा सकता है। मंदिर हजारों वर्ष पुराना है, लेकिन इसका इतिहास हमारे पास मौजूद नहीं है।

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