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क्या भावनात्मक मसले ही मुख्य चुनावी मु६ा बनेंगे।

By on November 28, 2018 0 85 Views

 

विधानसभा चुनाव वाले पांच में से तीन राज्यों के भाजपा शासित होने के कारण उन पर कुछ ज्यादा ही निगाह होना स्वाभाविक है। इन तीन में से एक छत्तीसगढ़ में मतदान हो चुका है। और दो अन्य राज्यों-राजस्थान एवं मध्य प्रदेश में चुनाव प्रचार जोरों पर है। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में ध्यान अधिक कंद्रित होने का एक कारण यह भी है कि यहां भाजपा की सीधी टक्कर कांग्रेस से है। तेलंगाना और मिजोरम में स्थिति भिन्न्ा् है। चूंकि भाजपा शासित छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान विधानसभा चुनावों के नतीजे अगले आम चुनाव के बारे में भी संकेत देंगे, इसीलिए यहां के चुनावों को लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल भी कहा जा रहा है। इन तीनों राज्यों में लोकसभा की 65 सीटें है। पिछले लोकसभा चुनाव में इनमें करीब 60 भाजपा के हिस्से में गई थी। हालांकि मतदाता विधानसभा और लोकसभा चुनाव पर असर भी डालते हैं। इन तीनों राज्यों में भाजपा को सत्ता विरोधी रूझान का सामना करना पड़ रहा है तो यह स्वाभाविक है, क्योंकि छत्तीसगढ़ में रमन सिंह और मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चैहान अपने चैथे कार्यकाल के लिए चुनाव मैदान में हैं।

भाजपा को छत्तीसगढ़ की तरह मध्य प्रदेश में भी इसलिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है, क्योंकि तमाम विकास कार्यों के बाद भी आम जनता और खासकर ग्रामीण क्षेत्र की जनता में कुछ मसलों को लेकर असंतोष है। इस असंतोष का मूल कारण सफल मानी जाने वाली भावांतर योजना के बाद भी किसानों की हालत में अपेक्षित सुधार न होना है। यह ध्यान रहे कि चुनावों में ग्रामीण मतदाता और खासतौर पर किसान ही निर्णायक साबित होते हैं। वे बदलाव के पक्ष मे तब जाते हैं, जब या तो गहरे संकट में हो या फिर किसान भावनात्मक मु६े से प्रभावित हो गए हों। यह सही है कि शिवराज सिंह चैहान के प्रयासों से मध्य प्रदेश कृषि में सबसे बड़ा उत्पादक राज्य बना, परन्तु औद्यौगिक विकास के नाम पर राज्य में उतना कुछ नहीं हो सका, जिसकी अपेक्षा थी। इसी कारण रोजगार के अवसरों में कमी दिखती है। इस सबके बावजूद शिवराज सिंह सामाजिक विकास की अपनी योजनाओं के कारण खासे लोकप्रिय हैं। यह लोकप्रियता ही भाजपा की एक बड़ी ताकत है। यह भी उनके पक्ष में है कि कांग्रेस की ओर से अलग होकर चुनाव लड़ना भी भाजपा के लिए फायदेमंद हो सकता है।
विरोधी दल छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में विकास की कमी को लेकर रमन सिंह और शिवराज सिंह पर चाहे जनता निशाना साधे, मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला करके एक तरह से भाजपा के लिए ही स्थिति आसान करने का काम किया है। चुनाव नतीजे कुछ भी हों, यह ठीक नहीं कि विकास पर इतना जोर देने के बाद भी भाजपा छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में उसे मुख्य चुनावी मु६े में तब्दली नहीं कर सकी। अगर चुनावी राजनीति इस तरह विकास के मु६ों को हाशिये पर ले जाती रहेगी, तो फिर भावनात्मक मसले ही चुनावी मु६ा बनेंगे।
राजस्थान का मामला छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश से भिन्न्ा् है। इस राज्य में हर पांच साल में सत्ता बदलने का सिलसिला कायम है। इसी कारण मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए मुश्किल दिख रही है। उनका मुकाबला कांग्रेस के सचिन पायलट और अशोक गहलोत से है। दोनों ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं। कांग्रेस नेतृत्व ने जिस तरह दोनों को चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया, उससे यही पता चल रहा कि वह किसी एक को मुख्यमंत्री के दावेदार के तौर पर आगे लाने का साहस नहीं जुटा सका। इसके चलते पार्टी में गुटबाजी है और अब तो अशोक गहलोत यहंा तक कह रहे है कि कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद के एक नहीं, सात दावेदार है।

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